बोधगया मंदिर विवाद: बौद्धों का आंदोलन क्यों हो रहा है तेज?

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बोधगया मंदिर विवाद पर बौद्धों का बढ़ता आंदोलन

बोधगया मंदिर विवाद: बौद्धों का आंदोलन क्यों हो रहा है तेज?

बिहार के बोधगया में बौद्ध अनुयायी लगातार आंदोलन कर रहे हैं। उनका कहना है कि महाबोधि मंदिर पूरी तरह बौद्धों के नियंत्रण में होना चाहिए। इस आंदोलन को दो महीने से ज्यादा हो चुके हैं।

क्या है महाबोधि मंदिर का विवाद?

महाबोधि मंदिर वही जगह है जहां गौतम बुद्ध को बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान मिला था। यह बौद्धों की सबसे पवित्र जगहों में से एक है। लेकिन यहां का प्रबंधन बौद्धों के हाथ में नहीं है।

1949 में बना बोधगया मंदिर अधिनियम (BGTA) मंदिर प्रबंधन को लेकर नियम तय करता है। इसके अनुसार, मंदिर समिति में चार बौद्ध और चार हिंदू सदस्य होते हैं। गया का जिलाधिकारी इसका अध्यक्ष होता है। अगर डीएम गैर-हिंदू हो, तो राज्य सरकार किसी हिंदू को अध्यक्ष नियुक्त करती है।

बौद्धों की आपत्ति क्या है?

बौद्ध संगठनों का कहना है कि यह मंदिर सिर्फ बौद्ध धर्म का है। इसमें हिंदू रीति-रिवाजों को शामिल करना गलत है। उनका आरोप है कि मंदिर में गैर-बौद्ध अनुष्ठान कराए जाते हैं। इसी वजह से वे BGTA को खत्म करने की मांग कर रहे हैं।

27 फरवरी को कुछ बौद्ध भिक्षु मंदिर में उपवास पर बैठे थे। वे गैर-बौद्ध अनुष्ठानों का विरोध कर रहे थे। उसी रात उन्हें जबरन मंदिर से हटा दिया गया। इसके बाद आंदोलन तेज हो गया।

इतिहास क्या कहता है?

13वीं शताब्दी तक मंदिर पर बौद्धों का नियंत्रण था। फिर यह हिंदू मठ बन गया। 19वीं सदी में श्रीलंका के भिक्षु अनागारिक धम्मपाल ने इसे बौद्धों को लौटाने की मांग उठाई। इसी संघर्ष के चलते 1949 का कानून बना।

यह विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। दो बौद्ध भिक्षुओं ने BGTA को रद्द करने की याचिका दायर की है। लेकिन याचिका अभी सूचीबद्ध नहीं हुई है।

क्या कहता है 1991 का उपासना स्थल कानून?

इस कानून के तहत 15 अगस्त 1947 के बाद किसी धार्मिक स्थल का स्वरूप नहीं बदला जा सकता। इसी वजह से बोधगया विवाद कानूनी रूप से और भी जटिल हो जाता है।

भारत के अलावा श्रीलंका, थाईलैंड और नेपाल जैसे देशों में भी बौद्ध संगठन प्रदर्शन कर चुके हैं। उनका मानना है कि बोधगया मंदिर केवल बौद्धों के लिए है और इसका प्रबंधन भी उन्हीं के पास होना चाहिए।

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